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क्या गांधी के कारण हुई थी भगत सिंह को फांसी,आज जानिए सारा सच

दोस्तो ये तो सभी को मालूम है कि आज से 91साल पहले आज के ही दिन 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह ,राज गुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी । ऐसे में कुछ लोगो का मानना है कि भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी गांधी जी की वजह से दी गई थी और कुछ लोग इस बात को नही मानते आखिर क्या है इसके पीछे की सच्चाई जानने के लिए लेख को अंत तक जरूर पढ़े

उसे ये फिक्र है हरदम, नया तर्जे-जफा क्या है, हमें ये शौक है देखें, सितम की इंतहा क्या है…ये शेर शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने खुद को फांसी दिए जाने से 20 दिन पहले लिखा था। तारीख- 3 मार्च 1931। जगह थी लाहौर सेंट्रल जेल। भगत सिंह के छोटे भाई कुलतार सिंह उनसे मुलाकात करने आए थे। 12 साल के कुलतार की आंखों में भाई की जुदाई का ख्याल सोचकर ही आंसू आ गए थे। इसी दिन भगत सिंह ने फांसी का फंदा चूमने से पहले भाई कुलतार के नाम अंतिम खत लिखा था। इस देश में शहीद-ए-आजम की फांसी की जब-जब चर्चा होती है, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी बहस के केंद्र में होते हैं। जेहन में सवाल उठता है कि क्या गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रोक सकते थे? क्या बापू ने भगत सिंह की सजा-ए-मौत रुकवाने की कोशिश की थी? क्या गांधीजी नहीं चाहते थे कि इंकलाबी क्रांतिकारी की फांसी रुके? वो भी तब जब गांधी-इरविन समझौते पर पूरा देश टकटकी लगाए हुए था।

‘भगत सिंह की शोहरत गांधी से ज्यादा दिखती है’
भगत सिंह की तस्वीरें भारत के हर शहर और हर कस्बे में बिक रही हैं। उनकी शोहरत इस समय श्री गांधी (महात्मा गांधी) से ज्यादा दिखती है। 1935 में इंटेलिजेंस ब्यूरो के ब्रिटिश डायरेक्टर सर होरेस विलियमसन ने भगत सिंह की फांसी के चार साल बाद यह नोट लिखा था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भगत सिंह की लोकप्रियता का आलम क्या था। अब आपको ले चलते हैं फरवरी 1931 के दौर में। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ महात्मा गांधी के आंदोलन रंग ला रहे थे और ऐसे ही वक्त में 17 फरवरी 1931 को गांधी-इरविन समझौते की बातचीत शुरू हुई। पांच मार्च 1931 को ये समझौता पूरा हुआ। इसमें अहिंसक आंदोलन करते हुए पकड़े गए सभी कैदियों को छोड़ने की बात पर सहमति बनी। इस समझौते पर पूरे हिंदुस्तान की नजर इसलिए टिकी थी क्योंकि लोग गांधी से उम्मीद लगाए बैठे थे कि वह भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे।

यंग इंडिया में गांधी ने फांसी के मुद्दे पर लिखा लेख
समझौते की शर्तों में भगत सिंह की फांसी को टालने की मांग भी शामिल करने की आवाज जोर-शोर से उठ रही थी। लेकिन महात्मा गांधी ने फांसी रोकने या टालने की शर्त समझौते में शामिल नहीं की। अपने अखबार यंग इंडिया में बापू ने आर्टिकल लिखा। इसमें उन्होंने कहा, ‘मेरी राय से कांग्रेस वर्किंग कमिटी भी सहमत थी। हम समझौते में यह शर्त नहीं शामिल कर सकते थे कि ब्रिटिश हुकूमत भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की सजा को कम करे। मैं वायसराय लॉर्ड इरविन से इस संबंध में अलग से बात कर सकता था।’ यही नहीं गांधी ने समझौते के ठीक अगले दिन यानी 18 फरवरी 1931 को भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी पर वायसराय से अलग से बात की।

गांधी ने इरविन से कहा- फांसी खत्म हुई तो माहौल सुधरेगा
गांधी खुद लिखते हैं, ‘मैंने इरविन से कहा कि इस मसले का हमारे समझौते और बातचीत से कोई ताल्लुक नहीं है। मेरी ओर से इसका जिक्र भी अनुचित लग सकता है। लेकिन अगर आप मौजूदा माहौल को सुधारना चाहते हैं तो आपको भगत सिंह, और उनके साथियों की सजा-ए-मौत खत्म कर दनी चाहिए। वायसराय को भी मेरी बात अच्छी लगी और उन्होंने कहा कि मुझे प्रसन्नता है कि आपने इस तरह से इस मुद्दे को मेरे सामने उठाया है। हालांकि उनकी फांसी की सजा को कम करना कठिन होगा लेकिन अभी के लिए उसे रोकने के बारे में सोचा जा सकता है।’

19 मार्च 1931 को गांधी ने फांसी पर इरविन से फिर की चर्चा
इसके ठीक अगले ही दिन 19 मार्च 1931 को भी महात्मा गांधी ने लॉर्ड इरविन से एक बार फिर भगत सिंह की फांसी के बारे में चर्चा की। इस पर इरविन ने जवाब दिया कि सिर्फ राजनैतिक वजहों से फांसी की तारीख को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा। इसके पीछे इरविन ने फांसी की तारीख के ऐलान की दलील भी दी। हालांकि इस कोशिश के नाकाम होने के बावजूद गांधी ने एक और प्रयास किया। 26 मार्च 1931 से कराची में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू होने वाला था। इसमें बापू को भी हिस्सा लेना था। भगत सिंह की फांसी की तारीख करीब आ रही थी। इससे तीन दिन पहले यानी 21 मार्च 1931 के न्यूज क्रॉनिकल में रॉबर्ट बर्नेज ने एक आर्टिकल लिखा।

21 मार्च को मुलाकात में इरविन ने गांधी से वादा किया
बर्नेज ने इसमें लिखा, ‘गांधी कराची अधिवेशन के लिए रवाना होने में इस वजह से देरी कर रहे हैं ताकि भगत सिंह की फांसी पर वायसराय से बात कर सकें।’ 21 मार्च को आखिरकार गांधी और इरविन की फिर मुलाकात हुई। बापू ने इरविन के सामने एक बार फिर फांसी रोकने की मांग रखी। 22 मार्च 1931 को गांधी और इरविन फिर साथ बैठे। इरविन ने गांधी से वादा किया कि वो भगत सिंह की फांसी के मुद्दे पर विचार करेंगे। 23 मार्च 1931 यानी फांसी की मुकर्रर तारीख से एक दिन पहले गांधी ने इरविन को एक खत लिखा। इसमें फांसी की सजा रोकने की अपील करते हुए अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कई दलीलें गिनाईं। लेकिन 23 मार्च 1931 की शाम को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गई।

25 मार्च को गांधी गो बैक के नारों के साथ हुआ बापू का स्वागत
नौजवान भगत सिंह जिंदाबाद, गांधी मुर्दाबाद, गांधी गो बैक…25 मार्च 1931 को महात्मा गांधी जब कराची अधिवेशन में शामिल होने के लिए पहुंचे तो कुछ इस तरह उनका स्वागत हुआ। भगत सिंह की फांसी से नाराज लोग जबरदस्त नारे लगा रहे थे। उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 25 मार्च की दोपहर में बहुत से प्रदर्शनकारी उस जगह तक पहुंच गए जहां गांधी टिके थे। कुछ अखबारों की रिपोर्ट में कहा गया कि गुस्साए हुए लोग चिल्ला रहे थे- ‘कहां हैं खूनी।’ इसी दौरान जवाहर लाल नेहरू इन प्रदर्शनकारियों को लेकर एक टेंट में गए और तकरीबन तीन घंटे तक बातचीत करते हुए समझाया-बुझाया। कांग्रेस के अंदर सुभाष चंद्र बोस समेत कई नेताओं ने भी गांधी-इरविन समझौते का विरोध किया था। ये धड़ा मानता था कि अंग्रेज सरकार अगर भगत सिंह की फांसी को माफ नहीं कर रही थी तो इस समझौते की कोई जरूरत नहीं थी।

स्वराज में गांधी ने लिखा- तो लोग खून में इंसाफ तलाशने लगेंगे
गांधीजी ने अपनी किताब स्वराज में लिखा, ‘भगत सिंह और उनके साथियों से अगर मुझे बात करने का मौका मिलता तो मैं उनसे कहता कि जो रास्ता उन्होंने चुना वह गलत और असफल है। ईश्वर को साक्षी मानकर मैं ये सत्य जाहिर करना चाहता हूं कि हिंसा के रास्ते पर चलकर स्वराज हासिल नहीं किया जा सकता। सिर्फ मुश्किलें मिल सकती हैं। 23 मार्च 1931 की सुबह मैंने वायसराय को एक खत लिखा। इस चिट्ठी में मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेलकर रख दी लेकिन मेरी सारी कोशिशें नाकाम हो गईं। भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे लेकिन हिंसा को अपना धर्म नहीं मानते थे। उन वीरों की वीरता को नमन जिन्होंने मौत के डर को भी जीत लिया था। उनके कृत्य से देश को फायदा हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता। अगर किसी का खून करके शोहरत पाने की देश में प्रथा चल पड़ी तो लोग एक-दूसरे के खून में इंसाफ की तलाश करने लगेंगे।’

मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी और…
23 मार्च 1931 की शाम हो चली थी। लाहौर में फांसीघर की ओर भगत सिंह के कदम बढ़ रहे थे। अपने दोनों क्रांतिकारी साथियों सुखदेव और राजगुरु के साथ वतन पर मर मिटने का जज्बा और हौसला लिए भगत सिंह एक गीत गा रहे थे- दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।

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