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जितिन और सिंधिया के बाद कांग्रेस का ये बड़ा नेता छोड़ेगा पार्टी

आजकल कांग्रेस का समय सही नही चल रहा है एक के बाद एक करके कई कांग्रेसी नेता अपनी पार्टी का सथा छोड़ते जा रहे है ! जबसे जितिन प्रसाद और सिंधियां ने कांग्रेस को छोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया है तबसे कांग्रेस और भी ज्यादा बौखला गयी है ! देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. पांच राज्यों में हालिया हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस  निराशाजनक प्रदर्शन ने जहां पार्टी को कमजोर किया है. वहीं, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा चेहरा कहे जाने वाले जितिन प्रसाद ने भाजपा का दामन थामकर 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव  से पहले राहुल गांधी की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है

ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने के बाद राहुल गांधी की ‘चौकड़ी’ से दो लोग बाहर हो चुके हैं. इन युवा तुर्कों के जाने के बाद अब सबकी निगाहें सचिन पायलट (Sachin Pilot) और मिलिंद देवड़ा (Milind Deora) पर आकर टिक गई हैं. इस स्थिति में सवाल उठ रहा है कि राहुल गांधी की इस ‘चौकड़ी’ से सिंधिया और जितिन प्रसाद के अब अगला कौन बाहर होगा? यूपीए-2 के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री रहे औऱ महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष रहे मिलिंद देवड़ा ने जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने से पहले ही गुजरात सरकार की तारीफ कर दी थी. देवड़ा ने एक ट्वीट कर गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के उस फैसले को स्वागतयोग्य बताया, जिसमें कोरोना महामारी की वजह से गुजरात में होटल इंडस्ट्री, रेस्टोरेंट, रिजार्ट और वॉटर पार्क के प्रभावित होने के कारण आर्थिक नुकसान को देखते हुए एक साल का प्रॉपर्टी टैक्स और बिजली बिल माफ किया गया था.

इसके साथ उन्होंने दूसरे राज्यों को भी इसका अनुकरण करने की सलाह दे डाली थी. मिलिंद देवड़ा का ये ट्वीट कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी कहा जा सकता है. हालांकि, देवड़ा भी ‘मोदी लहर’ का शिकार रहे हैं. 2014 के आम चुनाव से पहले वह मुंबई दक्षिण की लोकसभा सीट से दो चुनाव जीतने के बाद से लगातार हार रहे हैं. जितिन प्रसाद और मिलिंद देवड़ा की तुलना करने पर सामने आता है कि प्रसाद को जी-23 नेताओं में शामिल होने का खामियाजा भुगतना पड़ा है. लेकिन, देवड़ा ने अभी तक शीर्ष नेतृत्व पर कोई बयानबाजी नहीं की है. वैसे, ये पहला मौका नहीं है, जब मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस की लीक से हटकर कोई बयान दिया हो. वह पहले भी कई मौकों पर मोदी सरकार की तारीफ करते हुए कांग्रेस को नसीहत देते हुए नजर आए हैं. बीते साल गलवान घाटी में भारत के 20 सैनिकों के शहीद होने के बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार के खिलाफ हमला बोलना का कोई मौका नहीं छोड़ा था. राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के सभी नेताओं ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले दिया था.

लेकिन, उस दौरान मिलिंद देवड़ा ने कहा था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि चीनी हिमाकत में बढ़ोत्तरी का मामला देश में राजनीतिक कीचड़ उछालने में खराब हो गया. जब हमें चीन की हरकतों की निंदा और समाधान की तलाश में एकजुट होना चाहिए, तब हम आपसी फूट को उजागर कर रहे हैं. इससे पहले अमेरिका में हाउडी मोदी कार्यक्रम और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे पर भी मिलिंद देवड़ा कांग्रेस को नसीहत देते नजर आ चुके हैं. इस आधार पर कहा जा सकता है कि मिलिंद देवड़ा के लिए भी भाजपा में शामिल होने का रास्ता खुला हुआ है.

सचिन पायलट की ‘उड़ान’

बीते साल राजस्थान में भी मध्य प्रदेश जैसे हालात बन गए थे. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने बगावत कर दी थी. कांग्रेस सरकार गिरने के आसार बनने लगे, तो शीर्ष नेतृत्व ने नींद से जागते हुए स्थिति को संभालने के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा और अहमद पटेल को भेजकर सरकार बचा ली. लेकिन, सरकार बचाने के लिए सचिन पायलट से किए गए वादे अभी तक पूरे नही हुए हैं. बीते कुछ दिनों से राजस्थान में एक बार फिर से बगावत की सुगबुगाहट दिखाई देने लगी है. कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने यहां ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिशें शुरू कर दी है, लेकिन यह उतना आसान नजर नहीं आता हैं. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के हाल-फिलहाल समझौता करा देने पर कांग्रेस के लिए मुश्किल कुछ ही समय के लिए टलती नजर आ रही है. पायलट और गहलोत के बीच लड़ाई सरकार में पद या मंत्रियों से कहीं आगे जा चुकी है. दरअसल, मध्य प्रदेश की ही तरह राजस्थान में भी कांग्रेस ने ‘युवा नेतृत्व’ की जगह सोनिया गांधी के ‘करीबियों’ पर भरोसा जताया.

राजस्थान में पहले ही दिन से सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री पद के लिए मोर्चा खोल दिया था. लेकिन, शीर्ष नेतृत्व के दबाव के आगे उन्हें झुकना पड़ा. सचिन पायलट की महत्वाकांक्षा राजस्थान में मुख्यमंत्री बनने की है. पायलट पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि वो अशोक गहलोत के नीचे काम नहीं करेंगे. इसके बहुत सीधे मायने हैं कि सचिन पायलट चाहते हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बैठाया जाए. पायलट इससे कम पर मानने को तैयार नही होंगे. वहीं, अगर इसे अगले विधानसभा चुनाव तक के लिए टाल भी दिया जाता है, तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की तरह अशोक गहलोत के भी दोबारा सीएम पद के लिए अड़ने पर कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. सचिन पायलट अपने खेमे के विधायकों के साथ ही गहलोत खेमे के नाराज विधायकों को भी साधने की कोशिश में लगे हैं. इस स्थिति में कहा जा सकता है कि राजस्थान कांग्रेस में किसी भी समय बगावत भड़क सकती है

कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की दिशाहीनता

कांग्रेस की वर्तमान मुश्किलों की असल जड़ शीर्ष नेतृत्व की दिशाहीनता और निर्णायक फैसले लेने में उदसीनता है. राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने के बाद से परिस्थितियां और बिगड़ चुकी हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा में शामिल होना इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहा जा सकता है. पंजाब और राजस्थान में शीर्ष नेतृत्व के लचर रवैये से हालात बिगड़ते चले गए. कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व समय रहते गुटबाजी को खत्म कर देता, तो पार्टी को शायद ही इन मुश्किलों से दो-चार होना पड़ता. गुजरात में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल लंबे समय से गुटबाजी का शिकार हो रहे हैं. हालांकि, उनके भाजपा में जाने की संभावना काफी क्षीण नजर आती है, लेकिन राजनीति में कुछ भी हो सकता है. हाल ही में उन्होंने गुजरात के सीएम विजय रूपाणी को पत्र लिखकर ताउते तूफान में क्षतिग्रस्त हुए 235 से ज्यादा मंदिरों के पुनर्निर्माण के लिए सरकारी अनुदान देने की मांग की है.

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