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आजमगढ़ में मायावती की चाल, चुनाव से पहले बढ़ी अखिलेश यादव की टेंशन

दोस्तों इन दिनों आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव काफी सुर्खियों में बना हुआ है .आपको बता दे इस चुनाव से सम्बन्धित बहुत सी बैठके की जा रही है और बहुत से महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे है . खबर सामने आई है कि इन बैठको में लिए गये निर्णय से अखिलेश यादव  परेशानिया बढने वाली है . अब देखना ये है कि अखिलेश यादव अपनी आने वाली परेशानियों का क्या समाधान निकालते है . उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव  के बाद क्या होगा आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव का परिणाम ये तो आने वाला समय बतायेगा . पूरी खबर जानने के लिए खबर को अंत तक पढ़े .

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत के बाद एक ओर जहां भारतीय जनता पार्टी जीत का जश्न मना रही है तो वहीं विपक्षी पार्टियां हार के कारणों का पता लगाने और आगे की योजना बनाने में जुट गई हैं। इसी कड़ी में रविवार बहुजन समाज पार्टी की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। इस बैठक में बसपा सुप्रीमो मायावती  की ओर से कई बड़े फैसले लिए गए हैं। इनमें से एक फैसला सपा चीफ अखिलेश यादव की टेंशन बढ़ाने वाला है। करहल सीट से जीत के बाद अखिलेश यादव  ने आजमगढ़ लोकसभा सीट  से इस्तीफा दे दिया है और अब यहां उपचुनाव होगा। आजमगढ़ को यूपी में सपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। मायावती ने यहां से गुड्डू जमाली को उम्मीदवार घोषित किया है। गुड्डू जमाली बीते विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी के इकलौते कैंडिडेट थे जिनकी जमानत बची थी।

आजमगढ़ में मायावती की चाल, निशाने पर कौन


ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम छोड़ शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली एक बार फिर बसपा में लौट आए हैं। उनकी अपने पुरानी पार्टी में वापसी हुई है और आते ही बीएसपी ने उन्हें आजमगढ़ लोकसभा सीट से उपचुनाव के लिए प्रत्याशी भी घोषित कर दिया है। आजमगढ़ जिले की मुबारकपुर सीट से गुड्डू जमाली 2012 और 2017 का चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचे थे। बीते यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की चर्चा थी लेकिन बात बनी नहीं। इसके बाद इन्होंने ओवैसी की पार्टी से चुनाव लड़े लेकिन हार का सामना करना पड़ा। गुड्डू जमाली को इस चुनाव में 36 हजार से ज्यादा वोट मिले और पूरे प्रदेश में ओवैसी की पार्टी एक मात्र उम्मीदवार ऐसे रहे जो अपनी जमानत बचाने में कामयाब हुए। बीएसपी के इस फैसले एक बात तो तय है कि आजमगढ़ की लड़ाई रोचक होगी।

आजमगढ़ में जीत सपा के लिए क्यों है जरूरी


आजमगढ़ सपा का मजबूत गढ़ है। इस विधानसभा चुनाव में यह बात और भी पुख्ता हुई। आजमगढ़ में सपा ने जीत का रिकॉर्ड बनाते हुए सभी दस सीटों पर जीत हासिल की। विधानसभा चुनाव से पहले जब अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने की चर्चा शुरू हुई तो यह माना जा रहा था कि वो आजमगढ़ की किसी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। आजमगढ़ से ही उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी जीता था। हालांकि वो मैनपुरी की करहल सीट से लड़ें। नतीजों के बाद कयास लगने शुरू हुए कि विधायकी छोड़ेंगे या सांसदी।अखिलेश यादव ने हाल ही में लोकसभा से बतौर सांसद इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के बाद अब आजमगढ़ सीट पर उपचुनाव होंगे। बसपा सुप्रीमो मायावती ने अभी से ही अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया वहीं अब सपा चीफ अखिलेश यादव के सामने इस सीट को बचाने की चुनौती होगी। 2019 के लोकसभा चुनाव में जब मोदी लहर देखने को मिली उस वक्त भी अखिलेश यादव ने आजमगढ़ से शानदार जीत दर्ज की। अखिलेश यादव ने बीजेपी के दिनेश लाल निरहुआ को 2.5 लाख से अधिक वोटों से हराया। हालांकि उस वक्त मायावती की पार्टी उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ रही थी। यह सीट सपा के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि अखिलेश यादव खुद इस सीट से विजयी हुए थे और विधानसभा में भी सभी दस सीटें उनकी पार्टी को मिलीं। बसपा के बाद अब दूसरे दलों पर नजर रहेगी लेकिन एक बात तो तय है कि यहां मुकाबला दिलचस्प होगा।

बसपा हार से सबक

उत्तर प्रदेश के विधासभा चुनाव में इस बार सबसे अधिक किसी को नुकसान हुआ तो बीएसपी को। वोट प्रतिशत घटने के साथ ही सीटों की संख्या 1 पर आ गई। इन चुनावों में बीएसपी के वोट शेयर में 10 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की है। मायावती ने प्रदेश अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष के पदों को छोड़कर पार्टी की सभी इकाइयों को भंग कर दिया है। पार्टी की चुनावी हार पर चर्चा के लिए रविवार बुलाई गई एक बैठक में मायावती ने कार्रवाई की घोषणा की।

 

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