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योगी के मंत्रिमंडल में एक्स UP मुख्यमंत्री को नही मिला मौका,इस कारण से हुए बाहर

दोस्तों जैसा कि सभी को मालूम है शुक्रवार 25 मार्च 2022  को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  ने पद और गोपनीयता की शपथ ले  ली है .योगी आदित्यनाथ के साथ अन्य 52 मंत्रियों ने भी पद और गोपनीयता की शपथ ली. बता दे इस बार  योगी आदित्यनाथ  की कैबिनेट में बड़ा उलटफेर हुआ है .इस बार योगी जी के  मंत्रिमंडल से कई दिग्गजों को बाहर का रास्ता दिखा कर बहुत से ऐसे नये सदस्यों को शामिल किया किया जिनके नाम जानकार सभी आश्चर्यचकित है . इसके साथ ही खबर सामने आई है कि किसी ख़ास कारण  की वजह से एक्स UP मुख्यमंत्री को  योगी के मंत्रिमंडल में नही मिला मौका. क्या है पूरा मामला जानने के लिए खबर को अंत तक पढ़े .

योगी मंत्रिमंडल से आउट होने वालों में सबसे बड़ा नाम डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा का है। दिनेश शर्मा की जगह इस बार ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाया गया है। पाठक पिछली सरकार में कानून मंत्री थे। वहीं, सिराथू विधानसभा सीट से चुनाव हारने के बाद भी केशव प्रसाद मौर्य का पद बरकरार है। चुनाव हारने के बाद सबसे ज्यादा अटकलें केशव प्रसाद मौर्य को लेकर लगाई जा रहीं थीं। भाजपा ने केशव प्रसाद पर भरोसा क्यों जताया? दिनेश शर्मा के जगह ब्रजेश पाठक को क्यों चुना गया? आइए इसके पीछे का कारण जानते हैं…

पहले जान लीजिए दिनेश शर्मा क्यों बाहर हुए और ब्रजेश पाठक ही क्यों डिप्टी सीएम बने?

ब्राह्मण चेहरे के रूप में नहीं उभर पाए : डॉ. दिनेश शर्मा को 2017 में ब्राह्मण चेहरे के तौर पर डिप्टी सीएम बनाया गया था। सोशल इंजीनियरिंग को साधने के लिए भाजपा ने दो डिप्टी सीएम बनाए। इनमें एक पिछड़ा वर्ग से और दूसरा ब्राह्मण वर्ग था। इस बार भी ऐसा ही है। बस ब्राह्मण चेहरा बदल गया है।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय सिंह कहते हैं, ‘भाजपा ने जिस उम्मीद के साथ दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम बनाया था, वे उस पर खरे नहीं उतरे सके। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ब्राह्मण विरोधी होने के आरोप लग रहे थे, तब दिनेश शर्मा आक्रमता के साथ उसका जवाब नहीं दे पा रहे थे। उनकी जगह ब्रजेश पाठक ने कमान संभाली और योगी पर लग रहे हर तरह के आरोपों का खुलकर जवाब दिया। मंत्रिमंडल में इसका असर देखने को मिल रहा है। पाठक के प्रमोशन की बड़ी वजह यही है।’

केशव को क्यों नहीं हटाया गया?

दिनेश शर्मा के बाद अब दूसरा सवाल ये है कि योगी कैबिनेट से केशव प्रसाद मौर्य को क्यों नहीं हटाया गया? वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव कहते हैं, ‘केशव मौर्य 2017 के चुनाव के समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में ही भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें जीतीं। तब वह मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में थे, लेकिन उन्हें डिप्टी सीएम का पद मिला। केशव पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता बन चुके हैं। 2017 और फिर 2019 में भी उन्होंने पार्टी के लिए बहुत मेहनत की।’श्रीवास्तव आगे बताते हैं, ‘इस बार भी जब पिछड़े वर्ग के कई नेता पार्टी छोड़ रहे थे, तो केशव प्रसाद ने मजबूती के साथ पार्टी का ग्राफ बढ़ाया। वह अपनी सीट की बजाय पूरे प्रदेश में प्रचार करते रहे। चुनाव प्रचार में उनकी डिमांड भी काफी थी। चुनावी माहौल में उन्होंने 100 से ज्यादा रैलियां अकेले कीं। तमाम विरोधी लहर के बावजूद भाजपा ने जीत हासिल की। ये अलग बात है कि वे खुद अपनी सीट पर हार गए। ऐसे में पार्टी उनकी अहमियत अच्छी तरह से जानती है। इसलिए उन्हें वापस वही सम्मान दिया गया।’

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