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पहली फ़िल्म में केवल 1250 रुपये में दिलीप कुमार ने किया था काम,पर सुपरस्टार बनते ही

बॉलीवुड के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार बुधवार को 98 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। दिलीप साहब का बॉलीवुड करियर फिल्म ‘ज्वार भाटा’ (1944) से शुरू हुआ था। 1947 में उन्होंने ‘जुगनू’ में काम किया। इस फिल्म की कामयाबी ने दिलीप साहब को चर्चित कर दिया।

इसके बाद उन्होंने ‘शहीद’, ‘अंदाज’, ‘दाग’, ‘दीदार’, ‘मधुमति’, ‘देवदास’, ‘मुसाफिर’, ‘नया दौर’, ‘आन’, ‘आजाद’ जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया। अपने अभिनय से वो स्वतंत्र भारत के पहले दो दशकों में लाखों युवा दर्शकों के दिलों की धड़कन बन गए थे। उन्होंने अभिनय के माध्यम से कई मुद्दों को ब्लैक एंड वाइट सिनेमा के पर्दे पर प्रस्तुत किया।

दिलीप साहब ट्रेजेडी किंग के साथ ऑलराउंडर एक्टर भी कहे जाते थे। 25 साल की उम्र में वे देश के नंबर वन एक्टर के रूप में स्थापित हो गए थे। राजकपूर और देव आनंद के आने से ‘दिलीप-राज-देव’ की फेमस त्रिमूर्ति ने लोगों के दिलों पर लंबे समय तक राज किया।

दिलीप कुमार प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टॉकीज की देन हैं, जहां देविका रानी ने उन्हें काम और नाम दिया। यहीं वे यूसुफ सरवर खान से दिलीप कुमार बने और यहीं उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के लिए उन्हें 1250 रुपए मिले थे। उस वक्त उनकी उम्र 22 साल थी।

शूटिंग के दौरान खाली समय में क्रिकेट खेलते थे दिलीप साहब
दिलीप साहब को शूटिंग के दौरान जब भी वक्त मिलता था, वो क्रिकेट खेलना पसंद करते थे। सोशल मीडिया के जरिए अपनी पुरानी यादों का ताजा करना भी उनका आदतों में से एक था।

कभी पैसे के पीछे नहीं भागे
अशोक कुमार और शशधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान की फिल्मों में लेकर दिलीप कुमार के करियर को सही दिशा में आगे बढ़ाया। फिर नौशाद, महबूब, बिमल राय, के. आसिफ और दक्षिण के एसएस वासन ने दिलीप के साथ काम कर कई चर्चित फिल्में बनाईं। 44 साल की उम्र में अभिनेत्री सायरा बानो से शादी करने तक दिलीप कुमार ऐसी कई फिल्में कर चुके थे, जिनके लिए आज उन्हें याद किया जाता है। दिलीप साहब ने अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को पैसा कमाने के लिए कभी नहीं भुनाया।

पिता बनने का सपना अधूरा रह गया
सायरा बानो और दिलीप कुमार की लव स्टोरी शादी के अंजाम तक तो पहुंच गई, लेकिन इनके माता-पिता बनने का सपना अधूरा रह गया। ऐसा क्यों हुआ इसका खुलासा दिलीप साहब ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘द सबस्टांस एंड द शैडो’ में किया था। ​​​​​​इसमें बताया गया है कि दिलीप-सायरा ताउम्र माता-पिता क्यों नहीं बन सके

पद्मभूषण से दादा साहब फाल्के तक इस महानायक ने अपने करियर के दौरान करीब 60 फिल्मों में काम किया। उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि अभिनय के चलते उनकी इमेज खराब ना हो। उन्हें उनके अभिनय के लिए भारत सरकार ने 1991 में पद्मभूषण से नवाजा था। वहीं, 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड भी उन्हें मिल चुका है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान सरकार ने भी उन्हें 1997 में ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से नवाजा, जो पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

आजादी का नारा लगाने पर हुए थे गिरफ्तार
दिलीप साहब अब हमारे बीच नहीं रहे हैं, लेकिन एक अभिनेता से लेजेंड बनने का उनका सफर आसान नहीं रहा है। वे कुल 12 भाई-बहन थे। उनका बचपन काफी तंगहाली से गुजरा था। अंग्रेजी जानने के चलते उन्हें पुणे की ब्रिटिश आर्मी कैंटीन में असिस्टेंट की नौकरी मिल गई। दिलीप कुमार को कैंटीन में 36 रुपए मेहनताना मिलता था। इसी कैंटीन में एक दिन एक आयोजन में भारत की आजादी की लड़ाई का समर्थन करने के चलते उन्हें गिरफ्तार होना पड़ा था।

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